रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥१६३॥


कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दुःख के बोझ से शरीर सूख गया है। ऐसी दीख रही हैं मानो सोनेकी सुन्दर कल्पलताको वनमें पाला मार गया हो॥१६३॥

भरतहि देखि मातु उठि धाई।
मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥
देखत भरतु बिकल भए भारी।
परे चरन तन दसा बिसारी॥


भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ी। पर चक्कर आ जाने से मूछित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर को सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े॥१॥

मातु तात कहँ देहि देखाई।
कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥
कैकइ कत जनमी जग माझा।
जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।


[फिर बोले-] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगत में क्यों जनमी! और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई?-॥२॥

कुल कलंक जेहिं जनमेउ मोही।
अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी।
गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥


जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥३॥

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू।
मैं केवल सब अनरथ हेतू॥
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी।
दुसह दाह दुख दूषन भागी॥


पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ। मुझे धिक्कार है ! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना॥४॥

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