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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥१६७॥
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥१६७॥
जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं,
हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे॥१६७॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं।
पिसुन पराय पाप कहि देहीं।
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी।
बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
पिसुन पराय पाप कहि देहीं।
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी।
बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥
जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरों के
पापों को कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदों
की निन्दा करनेवाले और विश्वभर के विरोधी हैं;॥१॥
लोभी लंपट लोलुपचारा।
जे ताकहिं परधनु परदारा॥
पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा।
जौं जननी यहु संमत मोरा॥
जे ताकहिं परधनु परदारा॥
पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा।
जौं जननी यहु संमत मोरा॥
जो लोभी, लम्पट और लालचियों का आचरण करने वाले हैं; जो पराये धन और परायी
स्त्री की ताक में रहते हैं; हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं
उनकी भयानक गति को पाऊँ॥२॥
जे नहिं साधुसंग अनुरागे।
परमारथ पथ बिमुख अभागे॥
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई।
जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥
परमारथ पथ बिमुख अभागे॥
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई।
जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥
जिनका सत्सङ्ग में प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं; जो
मनुष्य शरीर पाकर श्रीहरि का भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर (भगवान् विष्णु और
शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता;॥३॥
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं।
बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ।
जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥
बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ।
जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥
जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष
बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी
मुझे उन लोगोंकी गति दें॥४॥
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