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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥१६६॥
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥१६६॥
कौसल्याजी के वचनोंको सुनकर भरत सहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा।
राजमहल मानो शोकका निवास बन गया।। १६६॥
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई।
कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।
भाँति अनेक भरतु समुझाए।
कहि बिबेकमय बचन सुनाए।
कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।
भाँति अनेक भरतु समुझाए।
कहि बिबेकमय बचन सुनाए।
भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय
से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी को समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें
उन्हें कहकर सुनायीं॥१॥
भरतहुँ मातु सकल समुझाई।
कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई॥
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।
बोले भरत जोरि जुग पानी॥
कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई॥
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।
बोले भरत जोरि जुग पानी॥
भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ
जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले-॥२॥
जे अघ मातु पिता सुत मारें।
गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें।
मीत महीपति माहुर दीन्हें॥
गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें।
मीत महीपति माहुर दीन्हें॥
जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के
नगर जलाने से होते हैं; जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो
मित्र और राजा को जहर देने से होते हैं-॥३॥
जे पातक उपपातक अहहीं।
करम बचन मन भव कबि कहहीं॥
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता।
जौं यहु होइ मोर मत माता॥
करम बचन मन भव कबि कहहीं॥
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता।
जौं यहु होइ मोर मत माता॥
कर्म, वचन और मन से होने वाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं,
जिनको कवि लोग कहते हैं, हे विधाता! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता! वे
सब पाप मुझे लगें॥४॥
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