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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥१७१॥
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥१७१॥
मुनिनाथने विलखकर (दुःखी होकर) कहा-हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान्
है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ॥१७१॥
अस बिचारि केहि देइअ दोसू।
ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥
तात बिचारु करहु मन माहीं।
सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥
ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥
तात बिचारु करहु मन माहीं।
सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥
ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें
विचार करो। राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं ॥१॥
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना।
तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।
जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥
तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना।
जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥
सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर
विषय-भोग में ही लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता
और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है॥२॥
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू।
जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥
सोचिअ सद्रु बिप्र अवमानी।
मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥
जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥
सोचिअ सद्रु बिप्र अवमानी।
मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥
उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा
शिवजीकी भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो
ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञानका
घमंड रखनेवाला है॥३॥
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी।
कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।
जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥
कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई।
जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥
पुन: उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पति को छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और
स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत
को छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता॥४॥
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