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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥१७२॥
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥१७२॥
उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्ग का त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान वैराग्यसे हीन है॥१७२॥
बैखानस सोइ सोचै जोगू।
तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी।
जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥
तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी।
जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥
वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच
उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता,
पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है ॥१॥
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी।
निज तनु पोषक निरदय भारी॥
सोचनीय सबहीं बिधि सोई।
जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥
निज तनु पोषक निरदय भारी॥
सोचनीय सबहीं बिधि सोई।
जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥
सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर
का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करने
योग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता ॥२॥
सोचनीय नहिं कोसलराऊ।
भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
भयउ न अहइ न अब होनिहारा।
भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥
भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
भयउ न अहइ न अब होनिहारा।
भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥
कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट
है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है।।३।।
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा।
बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥
बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते
हैं।॥ ४॥
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