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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सो०- भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।
बचन अमि जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥१७६॥
बचन अमि जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥१७६॥
धैर्यकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमलके समान हाथोंको जोड़कर,
वचनोंको मानो अमृतमें डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे- ॥ १७६ ॥
मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका।
प्रजा सचिव संमत सबही का॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा।
अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥
प्रजा सचिव संमत सबही का॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा।
अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥
गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत
है। माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा
ही करना चाहता हूँ॥१॥
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी।
सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू।
धरमु जाइ सिर पातक भारू॥
सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू।
धरमु जाइ सिर पातक भारू॥
[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न
मनसे उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म
जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है ॥२॥
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई।
जो आचरत मोर भल होई॥
जद्यपि यह समझत हउँ नीकें।
तदपि होत परितोषु न जी कें॥
जो आचरत मोर भल होई॥
जद्यपि यह समझत हउँ नीकें।
तदपि होत परितोषु न जी कें॥
आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करने में मेरा भला हो।
यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता
॥३॥
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू।
मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू।
दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥
मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू।
दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥
अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये।
मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुःखी मनुष्यके
दोष-गुणोंको नहीं गिनते॥४॥
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