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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥१७५॥
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥१७५॥
मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं-गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये।
श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा ॥ १७५ ॥
कौसल्या धरि धीरजु कहई।
पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥
सो आदरिअ करिअ हित मानी।
तजिअ बिषादु काल गति जानी।
पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥
सो आदरिअ करिअ हित मानी।
तजिअ बिषादु काल गति जानी।
कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं-हे पुत्र! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है। उसका
आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। कालकी गतिको जानकर
विषादका त्याग कर देना चाहिये॥१॥
बन रघुपति सुरपुर नरनाहू।
तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा।
तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा।
तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम
इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके
सबके एक तुम ही सहारे हो॥२॥
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई।
धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू।
प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥
धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू।
प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥
विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती
है। गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर
कुटुम्बियोंका दु:ख हरो॥३॥
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु।
सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी।
सील सनेह सरल रस सानी॥
सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी।
सील सनेह सरल रस सानी॥
भरतजी ने गुरु के वचनों और मन्त्रियों के अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके
हृदयके लिये मानो चन्दन के समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलताके
रस में सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी ॥४॥
छं०-सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके
नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदय के विरहरूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे।
(नेत्रों के आँसुओं ने उनके वियोग-दुःखको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त
व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी।
तुलसीदासजी कहते हैं-स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक
सराहना करने लगे।
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