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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम के राज॥१७८॥
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम के राज॥१७८॥
कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधमके राज्यसे आप
मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं।। १७८ ॥
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू।
चाहिअ धरमसील नरनाहू॥
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं।
रसा रसातल जाइहि तबहीं।
चाहिअ धरमसील नरनाहू॥
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं।
रसा रसातल जाइहि तबहीं।
मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये।
आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें फँस जायगी ॥१॥
मोहि समान को पाप निवासू।
जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।
बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥
जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा।
बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥
मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ?
राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया॥२॥
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू।
बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू।
रहे प्रान सहि जग उपहासू॥
बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू।
रहे प्रान सहि जग उपहासू॥
और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोंका कारण हूँ, होश-हवास में बैठा सब बातें सुन रहा
हूँ ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्का उपहास सहकर भी ये प्राण बने
हुए हैं ॥३॥
राम पुनीत बिषय रस रूखे।
लोलुप भूमि भोग के भूखे॥
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई।
निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥
लोलुप भूमि भोग के भूखे॥
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई।
निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥
[इसका यही कारण है कि ये प्राण] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं।
ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ ?
जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है॥४॥
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