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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥१७९॥
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥१७९॥
कारण से कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डी से वज्र और पत्थर
से लोहा भयानक और कठोर होता है।। १७९॥
कैकेई भव तनु अनुरागे।
पावर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे।
देखब सुनब बहुत अब आगे॥
पावर प्रान अघाइ अभागे॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे।
देखब सुनब बहुत अब आगे॥
कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करने वाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरह से)
अभागे हैं। जब प्रियके वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे
मैं और भी बहुत कुछ देखू-सुनूँगा ॥१॥
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा।
पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू।
दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥
पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू।
दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥
लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजीको तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पति का कल्याण किया;
स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजा को शोक और सन्ताप दिया;॥२॥
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू।
कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥
एहि तें मोर काह अब नीका।
तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥
कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥
एहि तें मोर काह अब नीका।
तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥
और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया!
इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देने को
कहते हैं ! ॥३॥
कैकइ जठर जनमि जग माहीं।
यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई।
प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥
यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई।
प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥
कैकेयी के पेट से जगत् में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी
सब बात तो विधाताने ही बना दी है। [फिर] उसमें प्रजा और पंच (आप लोग) क्यों
सहायता कर रहे हैं? ॥ ४॥
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