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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥१८१॥
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥१८१॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है।
इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं।। १८१।।
गुर बिबेक सागर जगु जाना।
जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ।
भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥
जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ।
भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥
गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व
हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं।
सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं ॥१॥
परिहरि रामु सीय जग माहीं।
कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी।
अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥
कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी।
अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें
मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी
होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है ॥२॥
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू।
परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी।
मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥
परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी।
मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥
मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोक का ही सोच है।
मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी
दु:खी हुए।॥३॥
जीवन लाहु लखन भल पावा।
सबु तजि राम चरन मनु लावा॥
मोर जनम रघुबर बन लागी।
झूठ काह पछिताउँ अभागी॥
सबु तजि राम चरन मनु लावा॥
मोर जनम रघुबर बन लागी।
झूठ काह पछिताउँ अभागी॥
जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके
चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं
अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ? ॥ ४॥
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