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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥
जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो], फिर जो वायुरोग से पीड़ित हो और
उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा
इलाज है!॥ १८०।।
कैकइ सुअन जोगु जग जोई।
चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥
दसरथ तनय राम लघु भाई।
दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।
चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥
दसरथ तनय राम लघु भाई।
दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।
कैकेयी के लड़के के लिये संसार में जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही
दिया। पर 'दशरथजीका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने
व्यर्थ ही दी॥१॥
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका।
राय रजायसु सब कहँ नीका॥
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही।
कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥
राय रजायसु सब कहँ नीका॥
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही।
कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥
आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सभीके लिये
अच्छी है। मैं किस-किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूं? जिसकी जैसी रुचि हो,
आपलोग सुखपूर्वक वही कहें ॥२॥
मोहि कुमातु समेत बिहाई।
कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥
मो बिनु को सचराचर माहीं।
जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।
कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥
मो बिनु को सचराचर माहीं।
जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।
मेरी कुमाता कैकेयी समेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा
किया गया? जड़-चेतन जगत् में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणों
के समान प्यारे न हों।। ३॥
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू।
अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥
संसय सील प्रेम बस अहहू।
सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥
अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥
संसय सील प्रेम बस अहहू।
सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥
जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसी का
दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील
और प्रेम के वश हैं ॥४॥
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