रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।१८३॥

यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजी का भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं ॥१८३।।

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे।
राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥
लोग बियोग बिषम बिष दागे।
मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥


भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विष से सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे॥१॥

मातु सचिव गुर पुर नर नारी।
सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥
भरतहि कहहिं सराहि सराही।
राम प्रेम मूरति तनु आही॥

माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमको साक्षात् मूर्ति ही है ॥२॥

तात भरत अस काहे न कहहू।
प्रान समान राम प्रिय अहहू॥
जो पावँरु अपनी जड़ताईं।
तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाईं।


हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता कैकेयी की कुटिलता को लेकर आप पर सन्देह करेगा, ॥३॥

सो सठु कोटिक पुरुष समेता।
बसिहि कलप सत नरक निकेता॥
अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई।
हरइ गरल दुख दारिद दहई॥


वह दुष्ट करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्पोंतक नरक के घर में निवास करेगा। साँप के पाप और अवगुण को मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विष को हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है॥४॥

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