रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥१८४॥

हे भरतजी! वन को अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्र में डूबते हुए सब लोगों को आपने [बड़ा] सहारा दे दिया॥१८४॥

भा सब के मन मोदु न थोरा।
जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥
चलत प्रात लखि निरनउ नीके।
भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥


सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रात:काल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये ॥१॥

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई।
चले सकल घर बिदा कराई।
धन्य भरत जीवन जग माहीं।
सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥


मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घरको चले। जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं ॥२॥

कहहिं परसपर भा बड़ काजू।
सकल चलै कर साजहिं साजू॥
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी।
सो जानइ जनु गरदनि मारी॥

आपसमें कहते हैं. बडा काम हआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी ॥३॥

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू।
को न चहइ जग जीवन लाहू॥


कोई-कोई कहते हैं—रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता?॥४॥

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