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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
श्रीरामजी को कोल किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध
छं०- सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे।
देवताओंका सम्मान (पूजन) और मुनियोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और
उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे। आकाशमें धूल छा रही है; बहुत-से पक्षी और पशु
व्याकुल होकर भागे हुए प्रभुके आश्रमको आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है? वे चित्तमें
आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलोंने आकर सब समाचार कहे।
सो०- सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥२२६॥
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥२२६॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मङ्गल वचन सुनते ही श्रीरामजीके मनमें बड़ा
आनन्द हुआ। शरीरमें पुलकावली छा गयी, और शरद्-ऋतुके कमलके समान नेत्र
प्रेमाश्रुओंसे भर गये ॥ २२६ ॥
बहुरि सोचबस भे सियरवनू।
कारन कवन भरत आगवनू।।
एक आइ अस कहा बहोरी।
सेन संग चतुरंग न थोरी॥
कारन कवन भरत आगवनू।।
एक आइ अस कहा बहोरी।
सेन संग चतुरंग न थोरी॥
सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोचके वश हो गये कि भरतके आनेका क्या कारण है ?
फिर एकने आकर ऐसा कहा कि उनके साथमें बड़ी भारी चतुरङ्गिणी सेना भी है॥१॥
सो सुनि रामहि भा अति सोचू।
इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं।
प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥
इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं।
प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिताके वचन और इधर भाई
भरतजीका संकोच! भरतजीके स्वभावको मनमें समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्तको
ठहरानेके लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं ॥ २ ॥
समाधान तब भा यह जाने।
भरतु कहे महुँ साधु सयाने।
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू।
कहत समय सम नीति बिचारू॥
भरतु कहे महुँ साधु सयाने।
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू।
कहत समय सम नीति बिचारू॥
तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहनेमें
(आज्ञाकारी) हैं। लक्ष्मणजीने देखा कि प्रभु श्रीरामजीके हृदयमें चिन्ता है तो
वे समयके अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे--- || ३ ॥
बिनु पूछे कछु कहउँ गोसाईं।
सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं।
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी।
आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥
सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं।
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी।
आपनि समुझि कहउँ अनुगामी॥
हे स्वामी! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समयपर ढिठाई करनेसे ढीठ
नहीं समझा जाता (अर्थात् आप पूछे तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह
मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा)। हे स्वामी ! आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं (सब
जानते ही हैं)। मैं सेवक तो अपनी समझकी बात कहता हूँ॥४॥
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