रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥२२७॥

हे नाथ! आप परम सुहृद् (बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहृदय तथा शील और स्नेहके भण्डार हैं, आपका सभीपर प्रेम और विश्वास है, और अपने हृदयमें सबको अपने ही समान जानते हैं ॥ २२७॥

बिषई जीव पाइ प्रभुताई।
मूढ़ मोह बस होहिं जनाई॥
भरतु नीति रत साधु सुजाना।
प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना॥


परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है ॥ १॥

तेऊ आजु राम पदु पाई।
चले धरम मरजाद मेटाई।
कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी।
जानि राम बनबास एकाकी॥


वे भरत भी आज श्रीरामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्मकी मर्यादाको मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवासमें अकेले (असहाय) हैं, ॥२॥

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू।
आए करै अकंटक राजू।
कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई।
आए दल बटोरि दोउ भाई॥


अपने मनमें बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्यको निष्कण्टक करनेके लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों) प्रकारकी कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं॥३॥

जौं जियँ होति न कपट कुचाली।
केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।
भरतहि दोसु देइ को जाएँ।
जग बौराइ राज पदु पाएँ।


यदि इनके हृदयमें कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियों की कतार [ऐसे समय] किसे सुहाती? परन्तु भरतको ही व्यर्थ कौन दोष दे? राजपद पा जानेपर सारा जगत् ही पागल (मतवाला) हो जाता है॥४॥

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