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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
श्रीरामजीका लक्ष्मणजीको समझानाएवं भरतजीकी महिमा कहना
देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [और कहा-] हे तात! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई! राज्यका मद सबसे कठिन मद है ॥३॥
जो अचवत नृप मातहिं तेई।
नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥
सुनहु लखन भल भरत सरीसा। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥
बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥
जिन्होंने साधुओंकी सभा का सेवन (सत्सङ्ग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिरा का आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है ॥४॥
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