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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥२३०॥
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥२३०॥
लक्ष्मणजीको अत्यन्त क्रोधसे तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक (सत्य)
सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबड़ाकर भागना चाहते हैं।।
२३०॥
जगु भय मगन गगन भइ बानी।
लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा।
को कहि सकइ को जाननिहारा॥
लखन बाहुबलु बिपुल बखानी॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा।
को कहि सकइ को जाननिहारा॥
सारा जगत् भयमें डूब गया। तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती हुई
आकाशवाणी हुई-हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान
सकता है? ॥१॥
अनुचित उचित काजु किछु होऊ।
समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥
सहसा करि पाछे पछिताहीं।
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥
समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥
सहसा करि पाछे पछिताहीं।
कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥
परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा
कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको
करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं॥२॥
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने।
राम सीयँ सादर सनमाने॥
कही तात तुम्ह नीति सुहाई।
सब तें कठिन राजमदु भाई॥
राम सीयँ सादर सनमाने॥
कही तात तुम्ह नीति सुहाई।
सब तें कठिन राजमदु भाई॥
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