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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरतजी मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूट पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी।
अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥
इहाँ भरतु सब सहित सहाए।
मंदाकिनी पुनीत नहाए॥
अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥
इहाँ भरतु सब सहित सहाए।
मंदाकिनी पुनीत नहाए॥
लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख
पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र
मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥२॥
सरित समीप राखि सब लोगा।
मागि मातु गुर सचिव नियोगा।
चले भरतु जहँ सिय रघुराई।
साथ निषादनाथु लघु भाई॥
मागि मातु गुर सचिव नियोगा।
चले भरतु जहँ सिय रघुराई।
साथ निषादनाथु लघु भाई॥
फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज
और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे॥३॥
समुझि मातु करतब सकुचाहीं।
करत कुतरक कोटि मन माहीं॥
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ।
उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥
करत कुतरक कोटि मन माहीं॥
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ।
उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥
भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर (याद करके) सकुचाते हैं और मनमें
करोड़ों (अनेकों) कुतर्क करते हैं [सोचते हैं-] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी
मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ॥४॥
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