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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ॥२३३॥
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ॥२३३॥
मुझे माताके मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर
(अपने विरद और सम्बन्धको देखकर) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर
ही करेंगे॥ २३३ ॥
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी।
जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥
मोरें सरन रामहि की पनही।
राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥
जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥
मोरें सरन रामहि की पनही।
राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥
चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें (कछ
भी करें): मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो
अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है॥१॥
जग जस भाजन चातक मीना।
नेम पेम निज निपुन नबीना।
अस मन गुनत चले मग जाता।
सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
नेम पेम निज निपुन नबीना।
अस मन गुनत चले मग जाता।
सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
जगत्में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया
बनाये रखने में निपुण हैं। ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं।
उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं ॥२॥
फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी।
चलत भगति बल धीरज धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ।
तब पथ परत उताइल पाऊ॥
चलत भगति बल धीरज धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ।
तब पथ परत उताइल पाऊ॥
माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले
भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते (स्मरण
करते) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं ॥३॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी।
जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥
देखि भरत कर सोचु सनेहू। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥
भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू॥
उस समय भरतकी दशा कैसी है ? जैसी जलके प्रवाहमें जलके भौंरेकी गति होती है। भरतजी का सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया (देहकी सुध-बुध भूल गया) ॥४॥
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