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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरै सुख संपदा सुकालु ॥२३५।।
करत अकंटक राजु पुरै सुख संपदा सुकालु ॥२३५।।
मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके
नगरमें सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान है ॥ २३५ ॥
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे।
जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना।
प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥
जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना।
प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥
वनरूपी प्रान्तोंमें जो मुनियोंके बहुत-से निवासस्थान हैं वही मानो शहरों,
नगरों, गाँवों और खेड़ोंका समूह है। बहुत से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही
मानो प्रजाओंका समाज है. जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १॥
खगहा करि हरि बाघ बराहा।
देखि महिष बृष साजु सराहा।
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा।
जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥
देखि महिष बृष साजु सराहा।
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा।
जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥
गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलोंको देखकर राजाके साजको सराहते ही
बनता है। ये सब आपसका वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो
चतुरङ्गिणी सेना है ॥२॥
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं।
मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥
चक चकोर चातक सुक पिक गन।
कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥
चक चकोर चातक सुक पिक गन।
कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
पानीके झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ
अनेकों प्रकारके नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलोंके समूह
और सुन्दर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं ॥ ३ ॥
अलिगन गावत नाचत मोरा।
जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥
बेलि बिटप तृन सफल सफूला।
सब समाजु मुद मंगल मूला।।
जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥
बेलि बिटप तृन सफल सफूला।
सब समाजु मुद मंगल मूला।।
भौरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्यमें
चारों ओर मङ्गल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलोंसे युक्त हैं। सारा
समाज आनन्द और मङ्गलका मूल बन रहा है ॥ ४॥
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