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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिराने नेमु॥२३६ ॥
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिराने नेमु॥२३६ ॥
श्रीरामजीके पर्वतकी शोभा देखकर भरतजीके हृदयमें अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे
तपस्वी नियमकी समाप्ति होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है।। २३६ ॥
मासपारायण, बीसवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई।
कहेउ भरत सन भुजा उठाई।
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।
पाकरि जंब रसाल तमाला॥
कहेउ भरत सन भुजा उठाई।
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला।
पाकरि जंब रसाल तमाला॥
तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजीसे कहने लगा हे नाथ! ये जो
पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं, ॥१॥
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा।
मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥
नील सघन पल्लव फल लाला।
अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥
मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥
नील सघन पल्लव फल लाला।
अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥
जिन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीचमें एक सुन्दर विशाल बड़का वृक्ष सुशोभित है, जिसको
देखकर मन मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे
हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली है ॥२॥
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी।
बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥
ए तरु सरित समीप गोसाँई।
रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।
बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥
ए तरु सरित समीप गोसाँई।
रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।
मानो ब्रह्माजीने परम शोभाको एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि सी रच दी
है। हे गुसाईं ! ये वृक्ष नदीके समीप हैं, जहाँ श्रीरामकी पर्णकुटी छायी है ॥३॥
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए।
कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।
बट छायाँ बेदिका बनाई।
सियँ निज पानि सरोज सुहाई॥
कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।
बट छायाँ बेदिका बनाई।
सियँ निज पानि सरोज सुहाई॥
वहाँ तुलसीजीके बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजीने और
कहीं लक्ष्मणजीने लगाये हैं। इसी बड़की छायामें सीताजीने अपने करकमलोंसे सुन्दर
वेदी बनायी है ॥४॥
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