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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्र का महल में जाना और वहाँ से लौटकर श्रीरामजी को महल में भेजना
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा।
केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥
कहु केहि रंकहि करौं नरेसू।
कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥
केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥
कहु केहि रंकहि करौं नरेसू।
कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥
हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज
किसको लेना (अपने लोकको ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगालको राजा कर दूं या
किस राजाको देशसे निकाल दूँ॥१॥
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी।
काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू।
मनु तव आनन चंद चकोरू।
काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू।
मनु तव आनन चंद चकोरू।
तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ।
बेचारे कीड़े मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो
मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है॥२॥
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें।
परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥
जौँ कछु कहौं कपटु करि तोही।
भामिनि राम सपथ सत मोही॥
परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥
जौँ कछु कहौं कपटु करि तोही।
भामिनि राम सपथ सत मोही॥
हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र,
यहाँतक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वशमें (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ
कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है।॥ ३॥
बिहसि मागु मनभावति बाता।
भूषन सजहि मनोहर गाता॥
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू।
बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥
भूषन सजहि मनोहर गाता॥
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू।
बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥
तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने
मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा। मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख। हे प्रिये!
जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे॥४॥
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