रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि, बिहसि उठी मतिमंद।
भूषन सजति बिलोकि मृगु, मनहुँ किरातिनि फंद॥२६॥


यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगंधको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंदा तैयार कर रही हो!॥२६॥


पुनि कह राउ सुहद जियँ जानी।
प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥
भामिनि भयउ तोर मनभावा।
घर घर नगर अनंद बधावा।


अपने जीमें कैकेयी को सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले-हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्द के बधावे बज रहे हैं॥१॥


रामहि देउँ कालि जुबराजू।
सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥
दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू।
जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥


मैं कल ही राम को युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो॥२॥


ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई।
चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥
लखहिं न भूप कपट चतुराई।
कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥


ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थरा की पढ़ायी हुई है।॥३॥


जद्यपि नीति निपुन नरनाहू।
नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी।
बोली बिहसि नयन मुह मोरी॥


यद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपरसे प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली--॥४॥

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