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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥२४२॥
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥२४२॥
हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री-सब
आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं।। २४२ ॥
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू।
सिय समीप राखे रिपुदवनू॥
चले सबेग रामु तेहि काला।
धीर धरम धुर दीनदयाला॥
सिय समीप राखे रिपुदवनू॥
चले सबेग रामु तेहि काला।
धीर धरम धुर दीनदयाला॥
गुरुका आगमन सुनकर शीलके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके पास शत्रुघ्नजी को
रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेग के
साथ चल पड़े॥१॥ गुरहि देखि सानुज अनुरागे।
दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।
मुनिबर धाइ लिए उर लाई।
प्रेम उमगि भेटे दोउ भाई॥
दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।
मुनिबर धाइ लिए उर लाई।
प्रेम उमगि भेटे दोउ भाई॥
गुरुजीके दर्शन करके लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेममें भर गये और
दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दौड़कर उन्हें हृदयसे लगा
लिया और प्रेममें उमँगकर वे दोनों भाइयोंसे मिले ॥२॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू।
कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
रामसखा रिषि बरबस भेंटा।
जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
रामसखा रिषि बरबस भेंटा।
जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
फिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको
दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि वसिष्ठजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा
लिया। मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो।३।।
रघुपति भगति सुमंगल मूला।
नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं।
बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।
नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं।
बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मङ्गलोंका मूल है इस प्रकार कह प्रकार कहकर सराहना
करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे--जगत्में इसके समान सर्वथा
नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन है ? ॥४॥
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