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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥२४१॥
भूरि भायँ भेटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥२४१॥
फिर श्रीरामजी प्रेमके साथ शत्रुघ्नसे मिलकर तब केवट (निषादराज) से मिले।
प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजीसे भरतजी बड़े ही प्रेमसे मिले। २४१ ॥
भेटेउ लखन ललकि लघु भाई।
बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे।
अभिमत आसिष पाइ अनंदे।
बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे।
अभिमत आसिष पाइ अनंदे।
तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंगके साथ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले। फिर उन्होंने
निषादराजको हृदयसे लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [उपस्थित]
मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए॥१॥
सानुज भरत उमगि अनुरागा।
धरि सिर सिय पद पदुम परागा।
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए।
सिर कर कमल परसि बैठाए॥
धरि सिर सिय पद पदुम परागा।
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए।
सिर कर कमल परसि बैठाए॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजी प्रेममें उमँगकर सीताजीके चरणकमलोंकी रज सिरपर
धारणकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजीने उन्हें उठाकर उनके सिरको अपने
करकमलसे स्पर्शकर (सिरपर हाथ फेरकर) उन दोनोंको बैठाया ॥२॥
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं।
मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥
सब बिधि सानुकूल लखि सीता।
भे निसोच उर अपडर बीता॥
मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥
सब बिधि सानुकूल लखि सीता।
भे निसोच उर अपडर बीता॥
सीताजीने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेहमें मग्न हैं, उन्हें देहकी
सुध-बुध नहीं है। सीताजीको सब प्रकारसे अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये
और उनके हृदयका कल्पित भय जाता रहा ॥३॥
कोउ किछ कह न कोउ किछ पँछा।
प्रेम भरा मन निज गति छंछा।
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि।
जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥
प्रेम भरा मन निज गति छंछा।
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि।
जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥
उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह
अपनी गतिसे खाली है (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चाञ्चल्यसे शून्य है)। उस अवसरपर
केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा-- ॥४॥
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