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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
वनवासियों द्वारा भरतजी की मण्डली का सत्कार
राम सैल बन देखन जाहीं।
जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥
झरना झरहिं सुधासम बारी।
त्रिविध तापहर त्रिबिध बयारी॥
जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥
झरना झरहिं सुधासम बारी।
त्रिविध तापहर त्रिबिध बयारी॥
सब श्रीरामचन्द्रजीके पर्वत (कामदगिरि) और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख
हैं और सभी दुःखोंका अभाव है। झरने अमृतके समान जल झरते हैं और तीन प्रकारकी
(शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकारके (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक)
तापोंको हर लेती है ॥ ३ ॥
बिटप बेलि तृन अगनित जाती।
फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं।
जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥
फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं।
जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥
असंख्य जातिके वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरहके फल, फूल और पत्ते हैं।
सुन्दर शिलाएँ हैं। वृक्षोंकी छाया सुख देनेवाली है। वनकी शोभा किससे वर्णन की
जा सकती है?॥४॥
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