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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भुंग।
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥२४९॥
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥२४९॥
तालाबोंमें कमल खिल रहे हैं, जलके पक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं
और बहुत रंगोंके पक्षी और पशु वनमें वैररहित होकर विहार कर रहे हैं ॥ २४९।।
कोल किरात भिल्ल बनबासी।
मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥
भरि भरि परन पुटी रचि रूरी।
कंद मूल फल अंकुर जूरी॥
मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥
भरि भरि परन पुटी रचि रूरी।
कंद मूल फल अंकुर जूरी॥
कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान
स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल
और अंकुर आदिकी जूड़ियों (अँटियों) को॥१॥
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा।
कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं।
फेरत राम दोहाई देहीं।
कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं।
फेरत राम दोहाई देहीं।
सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम
बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा
देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं ॥२॥
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी।
मानत साधु पेम पहिचानी॥
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा।
पावा दरसनु राम प्रसादा॥
मानत साधु पेम पहिचानी॥
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा।
पावा दरसनु राम प्रसादा॥
प्रेममें मग्न हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका
सम्मान करते हैं (अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या
वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम
नीच निषाद हैं। श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं ॥३॥
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा।
जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥
राम कृपाल निषाद नेवाजा।
परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥
जस मरु धरनि देवधुनि धारा॥
राम कृपाल निषाद नेवाजा।
परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा॥
हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा
दुर्लभ है! [देखिये,] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे
राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये।।४॥
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