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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सो०-बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥२५१॥
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम॥२५१॥
सब लोग दिनोंदिन परम आनन्दित होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली
वर्षाके जलसे मेढ़क और मोर मोटे हो जाते हैं (प्रसन्न होकर नाचते कूदते हैं)॥
२५१॥
पुर जन नारि मगन अति प्रीती।
बासर जाहिं पलक सम बीती।
सीय सासु प्रति बेष बनाई।
सादर करइ सरिस सेवकाई॥
बासर जाहिं पलक सम बीती।
सीय सासु प्रति बेष बनाई।
सादर करइ सरिस सेवकाई॥
अयोध्यापुरीके पुरुष और स्त्री सभी प्रेममें अत्यन्त मग्न हो रहे हैं। उनके दिन
पलके समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष (रूप) बनाकर सीताजी सब
सासुओंकी आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं ॥१॥
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