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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहुलखि नेहु।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥२५०॥
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥२५०॥
हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको
कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये।। २५० ॥
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे।
सेवा जोगु न भाग हमारे॥
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई।
ईंधनु पात किरात मिताई।
सेवा जोगु न भाग हमारे॥
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई।
ईंधनु पात किरात मिताई।
आप प्रिय पाहने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं
हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईंधन (लकड़ी) और
पत्तों ही तक है॥१॥
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई।
लेहिं न बासन बसन चोराई॥
हम जड़ जीव जीव गन घाती।
कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।
लेहिं न बासन बसन चोराई॥
हम जड़ जीव जीव गन घाती।
कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।
हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते।
हमलोग जड़ जीव हैं, जीवोंकी हिंसा करनेवाले हैं; कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और
कुजाति हैं॥२॥
पाप करत निसि बासर जाहीं।
नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥
सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ।
यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥
नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥
सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ।
यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ॥
हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न
पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्रमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो
श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है॥३॥
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे।
मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥
बचन सुनत पुरजन अनुरागे।
तिन्ह के भाग सराहन लागे॥
मिटे दुसह दुख दोष हमारे॥
बचन सुनत पुरजन अनुरागे।
तिन्ह के भाग सराहन लागे॥
जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियोंके
वचन सुनकर अयोध्याके लोग प्रेममें भर गये और उनके भाग्यकी सराहना करने लगे॥४॥
छं०- लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥
सब उनके भाग्यकी सराहना करने लगे और प्रेमके वचन सुनाने लगे। उन लोगोंके बोलने
और मिलनेका ढंग तथा श्रीसीतारामजीके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे
हैं। उन कोल-भीलोंकी वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेमका निरादर करते हैं (उसे
धिक्कार देते हैं)। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीकी
कृपा है कि लोहा नौकाको अपने ऊपर लेकर तैर गया।
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