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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
श्रीराम-भरतादि का संवाद
भानुबंस भए भूप घनेरे।
अधिक एक तें एक बड़ेरे॥
जनम हेतु सब कहँ पितु माता।
करम सुभासुभ देइ बिधाता॥
अधिक एक तें एक बड़ेरे॥
जनम हेतु सब कहँ पितु माता।
करम सुभासुभ देइ बिधाता॥
[और कहा-] सूर्यवंशमें एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभी के
जन्मके कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोको (कर्मोंका फल) विधाता देते
हैं ॥३॥
दलि दुख सजइ सकल कल्याना।
अस असीस राउरि जगु जाना।
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेकी।
सकइ को टारि टेक जो टेकी।
अस असीस राउरि जगु जाना।
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेकी।
सकइ को टारि टेक जो टेकी।
आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह
जगत् जानता है। हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति (विधान) को भी
रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी (जो निश्चय कर दिया) उसे कौन टाल सकता है ? ॥४॥
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