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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥२५५॥
अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के प्रेममय वचनों को
सुनकर गुरुजी के हृदयमें प्रेम उमड़ आया॥ २५५॥
तात बात फुरि राम कृपाहीं।
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥
सकुचउँ तात कहत एक बाता।
अरध तजहिं बुध सरबस जाता।
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥
सकुचउँ तात कहत एक बाता।
अरध तजहिं बुध सरबस जाता।
[वे बोले-] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही। रामविमुखको तो
स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ।
बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधेकी रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते
हैं ॥१॥
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई।
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता।
भे प्रमोद परिपूरन गाता॥
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता।
भे प्रमोद परिपूरन गाता॥
अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता और
श्रीरामचन्द्रको लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये।
उनके सारे अंग परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये॥२॥
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा।
जनु जिय राउ रामु भए राजा॥
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी।
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥
उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीरमें तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे
हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगोंको तो इसमें लाभ अधिक और
हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियोंको दुःख-सुख समान ही थे (राम-लक्ष्मण वनमें
रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रोंका वियोग तो रहेगा ही), यह समझकर वे सब रोने
लगीं ॥३॥
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे।
फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥
कानन करउँ जनम भरि बासू।
एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥
फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥
कानन करउँ जनम भरि बासू।
एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥
भरतजी कहने लगे--मुनिने जो कहा, वह करनेसे जगत्भरके जीवोंको उनकी इच्छित वस्तु
देनेका फल होगा। [चौदह वर्षकी कोई अवधि नहीं,] मैं जन्मभर वनमें वास करूँगा।
मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है ॥४॥
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