रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥२५७॥


आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं। जिसमें पुरवासियों का, माताओंका और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइये॥ २५७ ॥

आरत कहहिं बिचारि न काऊ।
सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।
नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥


आर्त (दुःखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है।मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे-हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है ॥ १ ॥

सब कर हित रुख राउरि राखें।
आयसु किएँ मुदित फुर भाषे॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।
माथे मानि करौं सिख सोई॥


आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ॥२॥

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।
सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा।
भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।


फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जायगा (आज्ञा पालन करेगा)। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे-हे राम! तुमने सच कहा। पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया।। ३॥

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी।
भरत भगति बस भइ मति मोरी॥
मोरें जान भरत रुचि राखी।
जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।


इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्ति के वश हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा॥४॥

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