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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।२५८॥
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।२५८॥
पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत,
लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसीके अनुसार)
कीजिये।। २५८॥
गुर अनुरागु भरत पर देखी।
राम हृदयँ आनंदु बिसेषी॥
भरतहि धरम धुरंधर जानी।
निज सेवक तन मानस बानी॥
राम हृदयँ आनंदु बिसेषी॥
भरतहि धरम धुरंधर जानी।
निज सेवक तन मानस बानी॥
भरतजीपर गुरुजी का स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजी के हृदयमें विशेष आनन्द हुआ।
भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर-- ॥१॥
बोले गुर आयस अनुकूला।
बचन मंजु मृदु मंगल मूला॥
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।
भयउ न भुअन भरत सम भाई॥
बचन मंजु मृदु मंगल मूला॥
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।
भयउ न भुअन भरत सम भाई॥
श्रीरामचन्द्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याणके मूल वचन
बोले-हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजीके चरणों की दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ
कि) विश्वभर में भरतके समान भाई कोई हुआ ही नहीं ॥२॥
जे गुर पद अंबुज अनुरागी।
ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥
राउर जा पर अस अनुरागू।
को कहि सकइ भरत कर भागू॥
ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी॥
राउर जा पर अस अनुरागू।
को कहि सकइ भरत कर भागू॥
जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और
वेदमें (पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का
ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है ? ॥३॥
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई।
करत बदन पर भरत बड़ाई॥
भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई।
अस कहि राम रहे अरगाई॥
करत बदन पर भरत बड़ाई॥
भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई।
अस कहि राम रहे अरगाई॥
छोटा भाई जानकर भरत के मुँहपर उसकी बड़ाई करनेमें मेरी बुद्धि सकुचाती है। (फिर
भी मैं तो यही कहूँगा कि) भरत जो कुछ कहें, वही करनेमें भलाई है। ऐसा कहकर
श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे ॥४॥
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