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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥२६०॥
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥२६०॥
मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेमके प्यासे मेरे
नेत्र आज तक प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए॥२६०॥
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा।
नीच बीचु जननी मिस पारा॥
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा।
अपनी समुझि साधु सुचि को भा॥
नीच बीचु जननी मिस पारा॥
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा।
अपनी समुझि साधु सुचि को भा॥
परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने [मेरे और स्वामी के
बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझसे
कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु
है)॥१॥
मातु मंदि मैं साधु सुचाली।
उर अस आनत कोटि कुचाली।
फरइ कि कोदव बालि सुसाली।
मुकता प्रसव कि संबुक काली॥
उर अस आनत कोटि कुचाली।
फरइ कि कोदव बालि सुसाली।
मुकता प्रसव कि संबुक काली॥
माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़
दुराचारोंके समान है। क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी
मोती उत्पन्न कर सकती है? ॥२॥
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू।
मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू।
जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू।
जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
स्वप्नमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है।
मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कटु वचन कहकर व्यर्थही
जलाया।॥३॥
हृदय हेरि हारेउँ सब ओरा।
एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू।
लागत मोहि नीक परिनामू॥
एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू।
लागत मोहि नीक परिनामू॥
मैं अपने हृदय में सब ओर खोजकर हार गया (मेरी भलाई का कोई साधन नहीं सूझता)। एक
ही प्रकार भले ही (निश्चय ही) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ
हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसीसे परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है
॥४॥
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