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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥२५९॥
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥२५९॥
तब मुनि भरतजी से बोले-हे तात! सब सङ्कोच त्यागकर कृपा के समुद्र अपने प्यारे
भाई से अपने हृदय की बात कहो।। २५९॥
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई।
गुरु साहिब अनुकूल अधाई॥
लखि अपने सिर सबु छरु भारू।
कहि न सकहिं कछुकरहिं बिचारू॥
गुरु साहिब अनुकूल अधाई॥
लखि अपने सिर सबु छरु भारू।
कहि न सकहिं कछुकरहिं बिचारू॥
मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर-गुरु तथा स्वामी को भरपेट
अपने अनुकूल जानकर-सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरत जी कुछ कह नहीं सकते। वे
विचार करने लगे॥१॥
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।
नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।
एहि तें अधिक कों में काहा॥
नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।
एहि तें अधिक कों में काहा॥
शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये। कमलके समान नेत्रोंमें
प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी। [वे बोले-] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया
(जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया)। इससे अधिक मैं क्या कहूँ? ॥२॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ।
अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहु बिसेषी।
खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।
अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहु बिसेषी।
खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।
अपने स्वामी का स्वभाव मैं जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते।
मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी रिस
(अप्रसन्नता) नहीं देखी ॥३॥
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू।
कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही।
हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥
कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही।
हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥
बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा
(मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हृदयमें
भलीभाँति देखा (अनुभव किया है)। मेरे हारनेपर भी खेल में प्रभु मुझे जिता देते
रहे हैं ॥४॥
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