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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ॥२६२॥
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ॥२६२॥
वे ही श्रीरघुनन्दन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयीके पुत्र
मुझको छोड़कर दैव दुःसह दुःख और किसे सहावेगा? ॥ २६२ ॥
सुनि अति बिकल भरत बर बानी।
आरति प्रीति बिनय नय सानी॥
सोक मगन सब सभाँ खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥
आरति प्रीति बिनय नय सानी॥
सोक मगन सब सभाँ खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥
अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ
वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मग्न हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया। मानो कमलके
वनपर पाला पड़ गया हो ॥१॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी।
भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
बोले उचित बचन रघुनंदू।
दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥
भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
बोले उचित बचन रघुनंदू।
दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥
तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी (ऐतिहासिक) कथाएँ कहकर भरतजीका
समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा
श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले-॥ २॥
तात जायँ जियँ करहु गलानी।
ईस अधीन जीव गति जानी।
तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें।
ईस अधीन जीव गति जानी।
तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें।
हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को ईश्वरके
अधीन जानो। मेरे मत में [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी
और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ॥३॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई।
जाइ लोकु परलोकु नसाई॥
दो देहिं जननिहि जड़ तेई।जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥
जाइ लोकु परलोकु नसाई॥
दो देहिं जननिहि जड़ तेई।जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई॥
हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़
जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती)।
माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका
सेवन नहीं किया है ॥ ४॥
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