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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥२६३॥
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥२६३॥
हे भरत ! तुम्हारा नाम-स्मरण करते ही सब पाप, प्रपञ्च (अज्ञान) और समस्त
अमङ्गलों के समूह मिट जायँगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त
होगा।। २६३॥
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी।
भरत भूमि रह राउरि राखी॥
तात कुतरक करहु जनि जाएँ।
बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ।
भरत भूमि रह राउरि राखी॥
तात कुतरक करहु जनि जाएँ।
बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ।
हे भरत ! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी
ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाये नहीं
छिपते॥१॥
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं।
बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना।
मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥
बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना।
मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥
पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधड़क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकों
को देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर
मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है॥२॥
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें।
करौं काह असमंजस जीकें।
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी।
तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥
करौं काह असमंजस जीकें।
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी।
तनु परिहरेउ पेम पन लागी॥
हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस
(दुविधा) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़
दिया॥३॥
तासु बचन मेटत मन सोचू।
तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा।
अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥
तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा।
अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा॥
उनके वचन को मेटते मन में सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर
भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही
करना चाहता हूँ॥४॥
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