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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥२६५॥
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥२६५॥
देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा-अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े
भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है॥ २६५।।
सीतापति सेवक सेवकाई।
कामधेनु सय सरिस सुहाई॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई।
तजहु सोचु बिधि बात बनाई।
कामधेनु सय सरिस सुहाई॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई।
तजहु सोचु बिधि बात बनाई।
सीतानाथ श्रीरामजी के सेवक की सेवा सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुन्दर है।
तुम्हारे मनमें भरतजी की भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाताने बात बना
दी॥१॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ।
सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥
मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहि जानि राम परिछाहीं॥
सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ॥
मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहि जानि राम परिछाहीं॥
हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके
पूर्णरूपसे वशमें हैं। हे देवताओ! भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी की परछाईं (परछाईं
की भाँति उनका अनुसरण करनेवाला) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है।॥२॥
सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू।
अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥
निज सिर भारु भरत जियँ जाना।
करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥
अंतरजामी प्रभुहि सकोचू॥
निज सिर भारु भरत जियँ जाना।
करत कोटि बिधि उर अनुमाना॥
देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओं की सम्मति (आपस का विचार) और उनका सोच सुनकर
अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजी को संकोच हुआ। भरतजी ने अपने मनमें सब बोझा अपने ही
सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे॥३॥
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका।
राम रजायस आपन नीका॥
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा।
छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥
राम रजायस आपन नीका॥
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा।
छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥
सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजी की
आज्ञामें ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ
कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया) ॥४॥
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