रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥२६६॥


श्रीजानकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले-- ॥२६६॥

कहौं कहावौं का अब स्वामी।
कृपा अंबुनिधि अंतरजामी॥
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला।
मिटी मलिन मन कलपित सूला॥


हे स्वामी! हे कृपाके समुद्र ! हे अन्तर्यामी! अब मैं [अधिक] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराज को प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी ॥१॥

अपडर डरेउँ न सोच समूलें।
रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।
मोर अभागु मातु कुटिलाई।
बिधि गति बिषम काल कठिनाई॥


मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। मेरे सोचकी जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माता की कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और काल की कठिनता, ॥ २॥

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला।
प्रनतपाल पन आपन पाला॥
यह नइ रीति न राउरि होई।
लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई॥


इन सबने मिलकर पैर रोपकर (प्रण करके) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [शरणागतकी रक्षाका] प्रण निबाहा (मुझे बचा लिया)। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है॥३॥

जगु अनभल भल एकु गोसाईं।
कहिअ होइ भल कासु भलाईं।
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ।
सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ॥


सारा जगत् बुरा [करनेवाला] हो; किन्तु हे स्वामी ! केवल एक आप ही भले (अनुकूल) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है ? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख (अनुकूल) है, न विमुख (प्रतिकूल)।।४।।

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥२६७॥


उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं।। २६७॥

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू।
मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू॥
अब करुनाकर कीजिअ सोई।
जन हित प्रभु चित छोभु न होई॥


गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा। हे दयाकी खान! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चित्तमें क्षोभ (किसी प्रकारका विचार) न हो॥१॥

जो सेवकु साहिबहि सँकोची।
निज हित चहइ तासु मति पोची।
सेवक हित साहिब सेवकाई।
करै सकल सुख लोभ बिहाई॥


जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे॥२॥

स्वारथु नाथ फिरें सबही का।
किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका॥
यह स्वारथ परमारथ सारू।
सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू॥


हे नाथ! आपके लौटने में सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करने में करोड़ों प्रकारसे कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका शृङ्गार है॥३॥

देव एक बिनती सुनि मोरी।
उचित होइ तस करब बहोरी॥
तिलक समाज साजि सब आना।
करिअ सुफल प्रभुजौं मनु माना।


हे देव! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये (उसका उपयोग कीजिये) ॥४॥

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