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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥२६९॥
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥२६९॥
प्रसन्न मन से संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा
चढ़ाकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी ॥ २६९॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे।
साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी॥
साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी॥
भरतजी के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते
हुए देवताओंने फूल बरसाये। अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [कि देखें अब
श्रीरामजी क्या कहते हैं]। तपस्वी तथा वनवासी लोग श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी
आशासे] मनमें परम आनन्दित हुए॥१॥
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची।
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।
जनक दूत तेहि अवसर आए।
मुनि बसिष्ठं सुनि बेगि बोलाए॥
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।
जनक दूत तेहि अवसर आए।
मुनि बसिष्ठं सुनि बेगि बोलाए॥
किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभुकी यह स्थिति (मौन) देख सारी
सभा सोचमें पड़ गयी। उसी समय जनकजीके दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजीने उन्हें
तुरंत बुलवा लिया ॥२॥
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