|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ॥२६८॥
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ॥२६८॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे वनमें भेज दीजिये और [अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ
कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी (यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों) हे नाथ!
लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपकेसाथ चलूँ॥ २६८ ॥
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई।
बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई॥
बहुरिअ सीय सहित रघुराई॥
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई॥
अथवा हम तीनों भाई वन चले जायँ और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित
[अयोध्याको] लौट जाइये। हे दयासागर ! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही
कीजिये॥१॥
देव दीन्ह सबु मोहि अभारू।
मोरें नीति न धरम बिचारू॥
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू॥
मोरें नीति न धरम बिचारू॥
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू॥
हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका
विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त
(दुःखी)
मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता॥२॥ उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई।
सो सेवकु लखि लाज लजाई।
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥
सो सेवकु लखि लाज लजाई।
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥
स्वामीकी आस सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवक को देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं
अवगुणों का ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी
(आप) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं ! ॥३॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा।
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ॥
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा॥
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ॥
हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे।
प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगतके कल्याणके लिये एक यही
उपाय है॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






