रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
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मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ॥२७१॥


गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिये।। २७१ ॥

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी।
जनक समाज जथामति बरनी॥
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति।
भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥

[गुप्त] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥१॥

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई।
लिए सुभट साहनी बोलाई॥
घर पुर देस राखि रखवारे।
हय गय रथ बहु जान सँवारे॥


फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवायीं ॥२॥

दुघरी साधि चले ततकाला।
किए बिश्रामु न मग महिपाला॥
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा।
चले जमुन उतरन सबु लागा।


वे दुघड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे, ॥३॥

खबरि लेन हम पठए नाथा।
तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥
साथ किरात छ सातक दीन्हे।
मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥


तब हे नाथ! हमें खबर लेने को भेजा। उन्होंने (दूतोंने) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने कोई छ:-सात भीलों को साथ देकर दूतों को तुरंत विदा कर दिया ॥४॥

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