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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥२७२॥
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥२७२॥
जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच
हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये॥ २७२।।
गरइ गलानि कुटिल कैकेई।
काहि कहै केहि दूषनु देई।
अस मन आनि मुदित नर नारी।
भयउ बहोरि रहब दिन चारी।
काहि कहै केहि दूषनु देई।
अस मन आनि मुदित नर नारी।
भयउ बहोरि रहब दिन चारी।
कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको
दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [अच्छा हुआ,
जनकजीके आनेसे] चार (कुछ) दिन और रहना हो गया॥१॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ।
प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥
करि मजनु पूजहिं नर नारी।
गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥
प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥
करि मजनु पूजहिं नर नारी।
गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥
इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रात:काल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान
करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं ॥२॥
रमा रमन पद बंदि बहोरी।
बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥
राजा रामु जानकी रानी।
आनँद अवधि अवध रजधानी॥
बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥
राजा रामु जानकी रानी।
आनँद अवधि अवध रजधानी॥
फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल
पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी
अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर- ॥३॥
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा।
भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥
एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥
देव देहु जग जीवन लाहू॥
फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्में जीनेका लाभ दीजिये॥४॥
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