रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ॥२७३॥

गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते ही हमलोग अयोध्या में मरें। सब कोई यही माँगते हैं।। २७३।।

सुनि सनेहमय पुरजन बानी।
निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन।
रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।


अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन्दा करते हैं। अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं ॥१॥

ऊँच नीच मध्यम नर नारी।
लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥
सावधान सबही सनमानहिं।
सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥

ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार श्रीरामजी का दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानी के साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं ॥२॥

लरिकाइहि तें रघुबर बानी।
पालत नीति प्रीति पहिचानी॥
सील सकोच सिंधु रघुराऊ।
सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥


श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं। वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं॥३॥

कहत राम गुन गन अनुरागे।
सब निज भाग सराहन लागे॥
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे।
जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥


श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते-कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगत्में हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं, जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं (ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं)॥४॥

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