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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥२७५॥
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥२७५॥
श्रीरामजी का आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जल से परिपूर्ण समुद्र है। जनकजी की
सेना (समाज) मानो करुणा (करुणरस) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी
शान्तरसके समुद्र में मिलाने के लिये] लिये जा रहे हैं।। २७५ ॥
बोरति ग्यान बिराग करारे।
बचन ससोक मिलत नद नारे॥
सोच उसास समीर तरंगा।
धीरज तट तरुबर कर भंगा।
बचन ससोक मिलत नद नारे॥
सोच उसास समीर तरंगा।
धीरज तट तरुबर कर भंगा।
यह करुणाकी नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती
है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें
(आहे) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गे हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम
वृक्षोंको तोड़ रही हैं ॥१॥
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