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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कोलकिरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप
बिषम बिषाद तोरावति धारा।
भय भ्रम भवर अबर्त अपारा॥
केवट बुध बिद्या बडि नावा।
सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥
भय भ्रम भवर अबर्त अपारा॥
केवट बुध बिद्या बडि नावा।
सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥
भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य
भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे
खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसीको उसकी अटकल ही
नहीं आती है ॥२॥
बनचर कोल किरात बिचारे।
थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥
आश्रम उदधि मिली जब जाई।
मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।
थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥
आश्रम उदधि मिली जब जाई।
मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।
वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें
हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह
समुद्र अकुला उठा (खौल उठा) ॥३॥
सोक बिकल दोउ राज समाजा।
रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥
भूप रूप गुन सील सराही।
रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥
रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥
भूप रूप गुन सील सराही।
रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥
दोनों राजसमाज शोक से व्याकुल हो गये। किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही
रही। राजा दशरथजी के रूप, गुण और शील की सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और
शोकसमुद्र में डुबकी लगा रहे हैं।। ४॥
छं०- अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हों कहा।
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हों कहा।
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।
शोकसमुद्र में डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच
(चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं
कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध,
तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की
दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मग्न हुए बिना रह सके)।
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