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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥२७७॥
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥२७७॥
निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे
स्नान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले
हैं।। २७७॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी।
जे मिथिलापति नगर निवासी॥
हंस बंस गुर जनक पुरोधा।
जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥
जे मिथिलापति नगर निवासी॥
हंस बंस गुर जनक पुरोधा।
जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥
जो दशरथजीकी नगरी अयोध्याके रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजीके नगर जनकपुरके
रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजीके पुरोहित
शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदयका मार्गतथा परमार्थका मार्ग छान डाला
था, ॥१॥
लगे कहन उपदेस अनेका।
सहित धरम नय बिरति बिबेका॥
कौसिक कहि कहि कथा पुरानी।
समुझाई सब सभा सुबानी॥
सहित धरम नय बिरति बिबेका॥
कौसिक कहि कहि कथा पुरानी।
समुझाई सब सभा सुबानी॥
वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे।
विश्वामित्रजी ने पुरानी कथाएँ (इतिहास) कह-कहकर सारी सभा को सुन्दर वाणी से
समझाया॥२॥
तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ।
नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई।
गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥
नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई।
गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥
तब श्रीरघुनाथजीने विश्वामित्रजीसे कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही
रह गये थे [अब कुछ आहार करना चाहिये। विश्वामित्रजीने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित
ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [आज भी] बीत गया॥३॥
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू।
इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥
कहा भूप भल सबहि सोहाना।
पाइ रजायसु चले नहाना॥
इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥
कहा भूप भल सबहि सोहाना।
पाइ रजायसु चले नहाना॥
विश्वामित्रजीका रुख देखकर तिरहुतराज जनकजीने कहा-यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है।
राजाका सुन्दर कथन सबकेमनको अच्छा लगा।सब आज्ञा पाकर नहाने चले ॥४॥
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