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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥२७८॥
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥२७८॥
उसी समय अनेकों प्रकारके बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझोंमें
भर-भरकर वनवासी (कोल-किरात) लोग ले आये।। २७८ ॥
कामद भे गिरि राम प्रसादा।
अवलोकत अपहरत बिषादा॥
सर सरिता बन भूमि बिभागा।
जनु उमगत आनँद अनुरागा॥
अवलोकत अपहरत बिषादा॥
सर सरिता बन भूमि बिभागा।
जनु उमगत आनँद अनुरागा॥
श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे
देखनेमात्रसे ही दुःखोंको सर्वथा हर लेते थे। वहाँके तालाबों, नदियों, वन और
पृथ्वीके सभी भागोंमें मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है॥१॥
बेलि बिटप सब सफल सफूला।
बोलत खग मृग अलि अनुकूला।
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू।
त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥
बोलत खग मृग अलि अनुकूला।
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू।
त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥
बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलोंसे युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भौरे अनुकूल
बोलने लगे। उस अवसरपर वनमें बहुत उत्साह (आनन्द) था, सब किसीको सुख देनेवाली
शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी॥२॥
जाइ न बरनि मनोहरताई।जनु महि करति जनक पहुनाई।
तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥
दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥
तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥
दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥
वनकी मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजीकी पहुनाई कर रही है। तब
जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनिकी आज्ञा पाकर,
सुन्दर वृक्षोंको देख-देखकर प्रेममें भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर
और अमृतके समान [स्वादिष्ट] अनेकों प्रकारके पत्ते, फल, मूल और कन्द- ॥ ३-४॥
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