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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ॥२७९॥
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ॥२७९॥
श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीने सबके पास बोझे भर-भरकर आदरपूर्वक भेजे। तब वे
पितर-देवता, अतिथि और गुरुकी पूजा करके फलाहार करने लगे॥ २७९ ॥
एहि बिधि बासर बीते चारी।
रामु निरखि नर नारि सुखारी।
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं।
बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥
रामु निरखि नर नारि सुखारी।
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं।
बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥
इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं।
दोनों समाजोंके मनमें ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजीके बिना लौटना अच्छा नहीं
है।॥१॥
सीता राम संग बनबासू।
कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥
परिहरि लखन रामु बैदेही।
जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥
कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥
परिहरि लखन रामु बैदेही।
जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥
श्रीसीतारामजी के साथ वनमें रहना करोड़ों देवलोकों के [निवासके] समान सुखदायक
है। श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजी को छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे,
विधाता उसके विपरीत हैं ॥ २॥
दाहिन दइउ होइ जब सबही।
राम समीप बसिअ बन तबही॥
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला।
राम दरसु मुद मंगल माला॥
राम समीप बसिअ बन तबही॥
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला।
राम दरसु मुद मंगल माला॥
जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजीके पास वनमें निवास हो सकता है।
मन्दाकिनीजीका तीनों समय स्नान और आनन्द तथा मङ्गलोंकी माला (समूह) रूप
श्रीरामका दर्शन, ॥३॥
अटनु राम गिरि बन तापस थल।
असनु अमिअसम कंद मूल फल॥
सुख समेत संबत दुइ साता।
पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।
असनु अमिअसम कंद मूल फल॥
सुख समेत संबत दुइ साता।
पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।
श्रीरामजीके पर्वत (कामदनाथ), वन और तपस्वियोंके स्थानोंमें घूमना और अमृतके
समान कन्द, मूल, फलोंका भोजन। चौदह वर्ष सुखके साथ पलके समान हो जायँगे (बीत
जायँगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे॥४॥
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