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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कौसल्या-सुनयना-संवाद
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं।
बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।
सीय मातु तेहि समय पठाईं।
दासीं देखि सुअवसरु आईं।
बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।
सीय मातु तेहि समय पठाईं।
दासीं देखि सुअवसरु आईं।
इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [सुनने वालोंके]
मनोंको हर लेते हैं। उसी समय सीताजीकी माता श्रीसुनयनाजीकी भेजी हुई दासियाँ
[कौसल्याजी आदिके मिलनेका] सुन्दर अवसर देखकर आयीं॥१॥
सावकास सुनि सब सिय सासू।
आयउ जनकराज रनिवासू।।
कौसल्याँ सादर सनमानी।
आसन दिए समय सम आनी॥
आयउ जनकराज रनिवासू।।
कौसल्याँ सादर सनमानी।
आसन दिए समय सम आनी॥
उनसे यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ इस समय फुरसतमें हैं, जनकराजका रनिवास उनसे
मिलने आया। कौसल्याजीने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर
दिये॥२॥
सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा।
द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन।
महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥
द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा॥
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन।
महि नख लिखन लगीं सब सोचन॥
दोनों ओर सबके शील और प्रेम को देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं।
शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रोंमें [शोक और प्रेमके] आँसू सब अपने
[पैरोंके] नखोंसे जमीन कुरेदने और सोचने लगीं ॥३॥
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति।
जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी।
जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।
जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी।
जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।
सभी श्रीसीतारामजी के प्रेम की मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष
(रूप) धारण करके विसूर रही हो (दुःख कर रही हो)। सीताजी की माता सुनयनाजी ने
कहा-विधाताकी बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूध के फेन-जैसी कोमल वस्तुको वज्र की
टाँकी से फोड़ रहा है (अर्थात् जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उनपर
विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है)॥४॥
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